Sunday, August 24, 2014

INTUTION


So many people used to come to Ramkrishna Paramhans while he was living at Dakhineshwar Kaalee Mandir. The temple was built by Raanee Raashmani. His son-in-law Mathur Babu was the administrator and care taker of the temple and her whole property. Most of the time, Ramkrishna remained in trance. By intuition he knew the inner thought and mental status of the person who came before him. Once Raanee came to worship Maa Kaalee. Ramkrishna was beside her to help her. Suddenly, he went in trance and gave a big slap to her saying ‘Your mind is away even being before Maa Kaalee’. This was a very embarrassing situation. A staff went to Mathur and told him the whole matter. He ran to the spot and started to rebuke Ramkrishna. But, Raanee stopped him and accepted her fault. Realy,her mind was not concentrated but was away. In the same way, Ramkrishna new the inner status of all visitors. Whenever he saw a person of black heart, he used to wash the seating place of the person with Gangaajal after his departure.

This type of riddhi-siddhi (blessings to know everything- present, past and future and hidden matters, and achieve all what one wants) come automatically when one goes ahead on the path of spiritualism. But one should not go behind them. The main purpose is to reach to goal. If one goes behind them, he will not reach the destination (The truth).

Sunday, August 17, 2014

BEAUTY


 

                          BEAUTIFUL   

 ‘ Roop yauvan sampannaa, vishaal kul sambhavaah;                                                                           Vidyaa heenaa na sobhante,nirgandhaa iv kinsukaah.’

A youth is very handsome, his family is also famous but he has not got education. He is similar to the flower of 'flame of the forest tree' (kinsuk= palaash) which has no scent. Similar is the case with a beautiful girl. Suppose she is very beautiful but quarrelling nature. She does not love her in-laws. Her character is not descent. Her physical beauty is in vain. She is also like the same flower. The shlok (Sanskrit poem) is old so I have not mentioned education in the case of a girl. Similarly the behavior & character have not been mentioned in the case of a boy. At present these words should be added.
I saw an old man. He was very handsome but his wife was ugly. He became close to me. Once I enquired about his marriage. He understood the matter and smiled. Laughingly he said that he had done love marriage. I was surprised but he stressed to believe me.
The man was living as paying guest at Kolkata during his P.G classes. His land lady was a widow having four marriageable daughters. He became very close to the family. The eldest was ugly by face and the rest three were beautiful. The eldest was doing all works of the family. The younger three were doing nothing and were totally dependent on the eldest. The man became impressed with the eldest and gave proposal before the widow. She was surprised to hear the proposal. Earlier, proposals were received for youngers because they were beautiful. The widow found the proposal as impossible blessings from The God. She agreed and married her daughter to the person. I was surprised and very much impressed hearing the story and his sacrifice.

                                        Now, it is clear regarding the beauty. It is not the physical appearance. The internal qualities are main beauty. If physical beauty is also there, it is like scent in the gold. But, physical beauty is not of much importance.  

Sunday, August 10, 2014

अवांछित पाहुन (७ )

सारनाथ स' लौटलहुँ मुदा तरुण के मौसीक ओहिठाम नहीं गेलहुँ। हमर ग्रामीण नूनूजी राजघाट मे रहैत छथि, ओतहि चलि गेलहुँ । नूनूजी के भेट गेलाक उपरांत आनंदे-आनंद। मुदा एकटा बड़का गलती भ' गेल; तरुण के नहि खबरि क' सकलियैक जे हम राजघाट जा रहल छी आ राति मे नहि लौटब। ओहि समय मे मोबाईल के सुविधा नहि छलैक आ ने हमरा लग तरुण के मौसा-मौसीक नम्बर छल।  देर राइत तक दूनू गोटे विभिन्न साधु-महात्मा सब स' सत्संग करैत रहलहुँ । फेर भोरे गंगा-स्नान क' क' काशी-विश्वनाथ के दर्शन केलहुँ आ पुनः अनेक मंदिर आ संत-समागम मे लागि गेलहुँ। ओही दिन करपात्रीजीक जन्मदिन छलनि । हुनका आश्रम में नंदना नन्द सरस्वतीजी  स' बेसी देरी तक हम दूनू गोटे धर्म-चर्चा मे व्यस्त रहलहुँ। पुनः टाउन हॉल मे जन्म दिवश समारोह मे शामिल भेलहुँ । अहि क्रम मे साँझ भ' गेल । साँझखन नूनू जी अपना डेरा गेलाह आ हमहूँ तरुण के मौसीक आवास पहुँचलहुँ।
ओहि आवास पर पहुँचलाक बादक वर्णन कठिन अछि। पूरा परिवार हमरा घेरि क' ठाढ़ भ' गेल आ अजीब प्रकार स' देखैत रहल। तरुण के मसियौत भाय अपन मोनक भरास निकालि देलक- ' हम बुझैत छलहुँ जे ई साधु  संत के चक्कर मे हेता। हमारा सबके चैन छीनि लेलाह। एखन हमर डेरा खाली करू।' अवाञ्छित पाहुन के देखितहि ओ पहिले दिन आक्रोषित भ' गेल छल होयत आ अपना माय आ पत्नी लग व्यक्त केने होयत, जे हमरा अज्ञात छल ।  आब मौक़ा भेटला संतां भभाक' बाहर निकलि गेलैक।
हम जेना पाहिले स' नियार केने होइ तहिना विना कोनो सफाई देने पांच मिनट मे सामान ल'क' बाहर निकललहुँ। आब तरुण आ ओकर मौसी आग्रह कर' लगलथि । मुदा हम नहि  मानलियन्हि। ओहो सब अंदर अंदर खुशी मनबैत दुराग्रह नहि केलथि। मजबूरी मे तरुण के सेहो विदा होम' पड़लैक। असहनीय गर्मी मे राति भरि मुगलसराय मे मच्छर कटाक' भोर मे डीलक्स-एक्सप्रेश  पकड़ि लौटलहुँ। काशीक ओ यात्रा जीवन भरि स्मरण रहत। काशीक पहिल यात्रा- विश्वनाथ मंदिर मे पंडा सबहक व्यवहार- सारनाथ भ्रमण आ ठक-गाइड स' भेट - नाव स' घाट दर्शन- करपात्रीजीक आश्रम मे नंदनानन्द सरस्वती जीक संग सत्संग- आ सबस'प्रमुख तरुणक मसिऔतक अवाञ्छित पाहुन संग स्वाभाविक व्यवहार।            

Saturday, August 9, 2014

रक्षाबंधन

मिथिलाञ्चल मे भाय-बहीनक एकटा पावनि भ्रातृ-द्वितीया प्रसिद्ध अछि। रक्षाबन्धन दिन  बुज़ुर्ग अपना स' छोट के राखी  बान्हैत छलाह आ अहि मन्त्र के पाठ करैत छलाह -' येन बद्धो वलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः, तान्त्वान् प्रतिबध्नामि रक्षेमाचलमाचल'. आन ठाम भाय-बहीन'क पावनिक रूप मे प्रख्यात अछि जाहि मे बहीन भाइक सुख-समृद्धिक कामना करैछ आ भाय ओकर रक्षाक संकल्प लैछ। आब  मिथिला मे सेहो अहि पावनि के भाय-बहीन मनाब' लगलीह अछि।
अनेको पौराणिक कथा रक्षा-बंधन मनाब' के उपलक्ष मे प्रचलित अछि। दैत्यराज बलि के पराक्रम स' भयभीत /अपमानित देवराज इन्द्र के रक्षा हेतु हुनक पत्नी शची भगवान विष्णु के शरण मे जाइत छथि। विष्णु शची के सूत स' बनल एकटा बलय (कंगना ) दैत छथिन्ह। शची ओहि रक्षा-सूत्र के इन्द्र के हाथ मे बान्हि दैत छथिन्ह। इंद्र विजयी होइत छथि।
एकटा अन्य उपाख्यान मे भगवान विष्णु द्वारा वामन भेष मे अपना गुरू द्वारा मना केलाक बादो दैत्यराज बलि ठकल जाइछ। विष्णु द्वारा वरदान प्राप्त करैछ जे ओ सदिखन बलिक सामने रहताह। बैकुंठ मे लक्ष्मी दुखी भ' गेली। दैत्यराज के हाथ मे राखी /रक्षा-सूत्र बान्हैत छथि आ ओकरा भाय बनबैत छथि। तत्पश्चात् ओकरा स' विष्णु के प्राप्त करैत छथि आ बैकुन्ठ ल' जाइत छथि।
शिशुपाल बध के समय कृष्ण के तर्जनी कटा जाइत छन्हि। द्रौपदी साड़ी फारिक' हुनका आंगुर मे बान्हैत छथि।भगवान चीरहरणक काल हुनक लाज बचा क' ऋण मुक्त होइत छथि।
अही प्रकारक अनेक कथा भेटैत अछि जखन पत्नी अपना पतिक रक्षाक हेतु शत्रु पक्ष के राखी पठेलन्हि आ शत्रु द्वारा पतिक अभयदान प्राप्त केलन्हि।
आधुनिक काल मे रक्षाबंधन वृहत् रूप मे मनाओल जा रहल अछि, मुदा जे बालिका बहीन बनती तिनका गर्भहि मे मारक प्रयास होइछ। जखन  बहीने नहि रहती त' फेर रक्षाबंधन कोना। भाय-बहीनक प्रेम नैसर्गिक होइछ। बहीन के भाय स' रुपैया-पैसा कथुक अपेक्षा नहि छन्हि। ओ मात्र प्रेम'क भुक्खल छथि। पत्नीक वश मे भाय, बहिन'क उपेक्षा क' सकैत छथि मुदा बहीनक प्रेम/स्नेह शास्वत रहैछ।
 
      

Wednesday, July 30, 2014

लोक-लाज

परम मित्र ललन के पिताक देहांत'क समाचार सूनि मोन दुखी भ' गेल। काल्हिये हुनका भेट क'र' गेल रही । कते टन-टन बजैत छलाह। तुरत हुनका गाम पर विदा होइत छी। शिवपुरी पहुञ्चि क' देखैत छी जे आन्गन मे तुलसी चौरा ल'ग मृत देह राखल अछि आ ललन आ हुनक पत्नी दहो-बहो नार बहा रहल छथि।आस-पड़ोसक लोक सभक करमान लागल अछि। इलाका के लोक सब जुटल अछि।  एतेक कलामी आदमी फेर जनम नहि लेत। जाबत पैरुख छलनि, हुनक धोती- कुरता पर कियो सिलवट्ट नहि देखलक। लील-टीनोपाल देल कलफ कैल चम-चम वस्त्र हुनक शान बघारैत छल। दू-तीन साल स' ओछौन ध' लेलाह। सुनै छियैक जे अइ जन्म मे जकरा जतेक कष्ट होइ छै ओकरा अगिला जन्म में ओते सुख भेटै छै। से हुनका सैह भेल। कियो-कियो दबल मूहे पूर्व जन्मक पापक फल कहैत छन्हि।खैर जे बात होइक मुदा हुनक कष्ट देखल नहि जाइत छल। दर्द स' अहुरिया काटैत छलाह, सौंसे घर ओंघराइत छलाह।
 जेबार के नोत पड़ल ।एहन भोज आइ तक नहि  देखलहुँ। पेपछ पड़ि गेलै।मिठाई, दूध-दही के  धार बहि गेल। बर-बरना भोज, सर सोल्हकन,पौनी-पसारी उइघ नहि सकल । कूकुर कौआ तक अघा गेल ।
माछ-माउस के भोज सेहो गाम ल'क' भेल। कैकटा खस्सी कटलै, कोनो गिनती नहि। 
एकटा फंटुश दबले मूँहे अनगौँवा बूझि कान मे फ़ुसफ़ुसायल- " सबटा टोप-टहंकार बेकार अछि।  जखन जीबै छला त' एकोटा बेटा घुरिक' नहि ताक' एलनि। 'जिवता मे गूहा भत्ता; मुइला मे दूधा भत्ता ।' एक गिलास पानि  लै टिटियाइत रहैत छलाह, कियो घुरि क' ताक' बला नहि। हुनका स' नीक त' मंटू, बाप के सेवा मे नोकरी तक छोडि देलक मुदा एकोटा माछी के बाप के देह पर नहि बैस' देलकै ।"
ओइ फंटुश के बात स' मोन खिन्न भ' गेल ।  चोट्टे गाम पड़ेलहु। दरबज्जा पर एकांत मे चिंतन मे लागल छी -" की अही लै लोक हाय-हाय करैत अछि? सबहक गरदनि काटि संतान लेल जमा कर' मे लागल रहै अछि, मुदा सब व्यर्थ। माया-मोह में फसल जीव आन्हर होइछ। यैह थिक दुनिया। सबके संग अहिना होइछ।"  मोन कोनादन कर' लागल आ दुर्गा मंदिर दिस ध्यान कर' लेल विदा भ' गेलहुँ।                  

Friday, July 25, 2014

अर्थ वनाम भाव

एक व्यक्ति स्तोत्र का पाठ करता जाता है लेकिन अर्थ नहीं समझता है। दूसरा अर्थ समझ-समझ कर पाठ करता है। इस कथन पर एक कहानी याद आ रही है। पुरोहित गीता पाठ कर रहे हैं  और क्षेत्रीय भाषा में अर्थ भी समझा रहे हैं । एक बूढ़ी महिला न तो मूल समझ रही है न' अर्थ ,चूंकि वह किसी अन्य क्षेत्र की है तथा संस्कृत भी नहीं जानती है। लेकिन पाठ श्रवण करते हुए उसके दोनों नेत्रों से अश्रुधार बह रहे हैं।अन्य श्रोताओं में वैसी प्रतिक्रिया नहीं परिलक्षित होती है। पाठ समाप्ति के पश्चात्  पण्डितजी उक्त बूढ़ी  महिला की ओर मुखातिव होते हैं- "माताजी आप क्या अर्थ समझ रही थी? आपके सदृश श्रोता बहुत काम मिलते हैं।" वृद्धा- "मै तो अर्थ विल्कुल नहीं समझ रही थी । मैं तो केवल देख रही थी कि कृष्ण सारथी हैं और अर्जुन रथ पर बैठे हैं। दोनों को देख कर मेरे नेत्रों से अश्रु बह रहे थे।"
                                      अब प्रश्न उठता है कि अर्थ की प्रधानता है या भाव की। साधारण व्यक्ति के लिए भाव का प्राधान्य है। मध्यम कोटि का व्यक्ति अर्थ समझ लेता है लेकिन उसी में उलझ कर रह जाता है। भाव पैदा नहीं कर पाता है। ज्ञानी को अर्थ एवं भाव दोनों प्राप्त होते हैं।
प्रथम भगवान को प्रिय है। अंतिम (ज्ञानी ) भगवान का स्वरुप ही है ।  बीच का कोई महत्व नहीं है।  कभी-कभी संदेह पैदा होने  पर नास्तिकता में वृद्धि हो जाती है। "संशयात्मा विनश्यति। "            

Thursday, July 24, 2014

"तस्य स्वर्ग इहैव ही"।

'पुत्राः यस्य वशीभूताः भार्या छन्दानुगामिनी ; विभवे यस्य  संतुष्टिः तस्य स्वर्ग इहैव ही' . स्वर्ग की कल्पना की गयी है -ऐसा स्थान जहाँ दुःख नाम के पदार्थ का स्तित्व नहीं हो, सुख भोग हेतु सभी वस्त्तु उपलभ्ध हो।
                    कवि ने तीन तथ्यों की चर्चा की है। तीनो दुर्लभ हैं। लाखों-करोड़ों लोगों में कोई एक भाग्यशाली होगा जिसे एक भी प्राप्त हो।  तीनो तो किसी-किसी विरले मनुष्य को ही प्राप्त होते हैं ।
    श्रवण कुमार दुनिया में कितने हैं ? इतर से वश में होने की कल्पना व्यर्थ है। सीता, सावित्री,अनसुइया कितनी  हैं ? फिर अन्यों से अनुगामिनी होने के बारे में सोचना ही नहीं चाहिए। प्रारब्ध से जो वैभव प्राप्त है उसी में सन्तुष्टि कितनो को है ? अयाची मिश्रा कितने  हैं ? साक्षात् शंकर को उनका पुत्र होना पड़ा। माँ भी कैसी कि घोर अभाव में रहते हुए भी प्रसूती कराने वाली धाय को प्रशव के समय गछा हुआ "पुत्र की पहली कमाई तुझे दूंगी" को स्मरण रखती है। राज दरवार से पुरस्कार में प्राप्त सोना-अशर्फी सभी आया को दे देती है। आया उनकी गरीबी को जानती है और नहीं लेना चाहती है। लेकिन उनकी जिद्द के आगे उसे लेना पड़ता है । कान को सहसा विश्वास नहीं होता है। अयाची की संतानों को याद रखना चाहिए।