Kamalji
Tuesday, April 7, 2026
बुद्धिक उपयोग
बुद्धि थिक अनमोल जगमे,
प्रकृति प्रदत उपहार ।
क्यो कपटी धर्मिष्ठ क्यो,
होइछ अपन संस्कार ।।
होइछ अपन संस्कार,
जेहन कुलमे जे जनमय ।
एक बनय अपकर्मी,
दोसर पुण्ये अरजय ।।
लोक सेवाभाव गंगा-
स्नानसँ हो शुद्धि ।
कपट तजि परमार्थमे
खर्चथु अपन सब बुद्धि ।।
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