Kamalji
Monday, April 6, 2026
पाहुन थिक सुख-दुख
सुख-दुखके पाहुन बुझू,
नै जिनगिक जंजाल ।
आयब-जायब करत द्वय,
टिकत ने बेसी काल ।।
टिकत ने बेसी काल,
जगक अनुभूति करायत ।
के अप्पन के आन,
अहाँके नित्य चिन्हायत ।।
अनासक्त रहि भोग,
रहू विषयासँ प्रतिमुख ।
सीत-रौद समभाव 'कमल',
थिक पाहुन सुख-दुख ।।
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