जँ नहि फुफकारब तँ जगमे,
साधुगणक जीयब नै संभव ।
यद्यपि नै अनुरक्त रहै छथि,
तदपि शरीरक टिकब असंभव ।।
तदपि शरीरक टिकब असंभव,
दुष्ट भरल अछि सकल जगतमे ।
जँ प्रतिकार करब नहि अपने,
जीयब नहि अछि सरल जगतमे ।।
मच्छर जोंक उड़ीसो भागत,
चुप्प-चाप बैसला सँ नहि ।
शांति अहाँके रहि नहि पाओत,
दुष्ट जंतु भगायब जँ नहि ।।
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