किछु लोकक छन्हि आदति सदिखन चुप्पे रहता,
गलती नहि छन्हि तैयो हरदम झुकले रहता ।
मुदा जतय नहि गलती तैठाँ झुकी ने कहियो,
जतय ने भेटय इज्जत तैठाँ रुकी ने कहियो ।।
कहियो ई जुनि सोची जे संघर्ष बिलायत,
जहियातक अछि जिनगी नव-नव रूप देखायत ।
अंतकालतक लड़बालए तैयार रही सब,
सुहृद-शत्रुगण जगतीमे चिन्हबामे आयत ।।
भुलियोक' निज स्थितिपर नै रोष उचित अछि,
स्वीकारब उपलब्ध परिस्थिति होइछ उचित अछि ।
जतबा भेल संघर्ष जनिक नामो भेल ततबा,
गिरिधर रघुवर मैथिलीक परतर के करता!!
सगरो पाथर डगरि बनल अछि वन-झाँखुरमे,
सौंसे ठोकर काँट-कूस बेधय पाँखुरमे ।
मुदा ने कखनो भय राखी रस्ताक कनिकबो,
धरू भरोस स्वयंपर कालो छथि चाँगुरमे ।।
कटि रहल जंगल मुदा सब भोट कुरहरिके भेटक अछि!
सोच अछि जे देश की छै, बेंट अपने जाति के अछि!!
बुझि पड़ै अछि तंत्र हम्मर खूब मजगुत भ' रहल!
सुरक्षा जनतंत्रलेल युवराज-नृप पागल बनल!!
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