Monday, April 27, 2026

भूलचूकसँ भेल पाप गंगाजी धोबथि

भूलचूकसँ भेल पापके,
गंगा देथि मेटाय ।
अंदर-बाहर शुद्ध भए, 
सकल पाप धुलि जाय ।।
सकल पाप धुलि जाय, 
त्रिपथगाकेँ जग जानय ।
दयामयी मायक महिमा,
सबलोक बखानय ।।
जानिबूझि कृत पाप,
मेटय यमराज शूलसँ ।
गंगा धोबथि पाप,
भेल जँ भूलचूकसँ ।।

रिश्ता रहत प्रगाढ़, रहि गेने मौने ।

मौने रहि गेने अहँक, 
रिश्ता रहत अटूटि ।
उचितो जँ बाजब अहाँ, 
रिश्ता जायत टूटि ।।
रिश्ता जायत टूटि, 
बाढ़ि उलहनके आयत ।
उकटा-पैंच, दुगोला; 
त्याग पाइनमे जायत ।।
कृत उपकार बिसारि, 
चुप्प बैसू ध' कोने ।
सबसँ प्रेम प्रगाढ़, 
रहत रहि गेने मौने ।।

Tuesday, April 7, 2026

बुद्धिक उपयोग

बुद्धि थिक अनमोल जगमे,
प्रकृति प्रदत उपहार ।
क्यो कपटी धर्मिष्ठ क्यो, 
होइछ अपन संस्कार ।।
होइछ अपन संस्कार, 
जेहन कुलमे जे जनमय ।
एक बनय अपकर्मी,
दोसर पुण्ये अरजय ।।
लोक सेवाभाव गंगा-
स्नानसँ हो शुद्धि ।
कपट तजि परमार्थमे 
खर्चथु अपन सब बुद्धि ।।

Monday, April 6, 2026

पाहुन थिक सुख-दुख

सुख-दुखके पाहुन बुझू,
नै जिनगिक जंजाल ।
आयब-जायब करत द्वय, 
टिकत ने बेसी काल ।।
टिकत ने बेसी काल,
जगक अनुभूति करायत ।
के अप्पन के आन,
अहाँके नित्य चिन्हायत ।।
अनासक्त रहि भोग, 
रहू विषयासँ प्रतिमुख ।
सीत-रौद समभाव 'कमल',
थिक पाहुन सुख-दुख ।।

Sunday, April 5, 2026

ध्यान स्रोतेपर राखू

राखू स्रोतेपर नजरि, निष्ठा राखू संग ।
फिकिर ने निंदकके करू, सतत रहू निःसंग ।।
सतत रहू निःसंग, धर्मके मार्ग ने त्यागी ।
कतबो होबय कष्ट, कर्मसँ दूर ने भागी ।।
कहथि 'कमल' सुनु धीर, अकथ कखनहुँ जुनि भाखू ।
अपन धर्मपर अडिग, नजरि स्रोतेपर राखू ।।

Friday, April 3, 2026

स्वार्थक मेला

दुनियाँक भीड़मे के अप्पन के आन ।
स्वार्थक मेला सब अपने सब आन ।। 
मतलबपर गोर लागत काज भेल भागत दूर ।
मानवता अछि शून्य छल-प्रपञ्च भरपूर ।।
सउँसे अछि गिद्ध पसरल उड़त अकास ।
नजरि छैक मुर्दापर वासनाक दास ।।
ककरोसँ उमेद नहि कखनो पलटि जायत ।
बिसबास जँ क' लेलहुँ सद्यः गाय गटकि जायत ।।
आइ अछि अहाँक संग काल्हि अनकर पछोड़ि ।
सप्पत खायत संग देबक संकटमे देत छोड़ि ।।
भरोस राखी विधातापर जे रचलनि संसार ।
दुनियाँ मात्र माया साँच हुनके टा दरबार ।।
जखन सब संग छोड़त बीच मझधार ।
वएह तखन हाथ पकड़त करत बेड़ापार ।।

Wednesday, March 25, 2026

मोन भारी नै करी

दुनियाँक भीड़मे के अप्पन के आन ।
स्वार्थक मेला सब अपने सब आन ।। 
मतलबपर गोर लागत काज भेल भागत दूर ।
मानवता अछि शून्य छल-प्रपञ्च भरपूर ।।
सउँसे अछि गिद्ध पसरल उड़त अकास ।
नजरि छैक मुर्दापर वासनाक दास ।।
ककरोसँ उमेद नहि कखनो पलटि जायत ।
बिसबास जँ क' लेलहुँ सद्यः गाय गटकि जायत ।।
आइ अछि अहाँक संग काल्हि अनकर पछोड़ि ।
सप्पत खायत संग देबक संकटमे देत छोड़ि ।।
भरोस राखी विधातापर जे रचलनि संसार ।
दुनियाँ मात्र माया साँच हुनके टा दरबार ।।
जखन सब संग छोड़त बीच मझधार ।
वएह तखन हाथ पकड़त करत बेड़ापार ।।