Kamalji
Tuesday, February 24, 2026
उलहन
वैवाहिक वर्षगाँठपर युगल-जोड़ी कएल विचार,
सालभरि लिखब एक-दोसरापर उलहन-विकार।
पत्नीक डायरीमे भरि गेल सगरो उलहन-
"अहाँ नै मानलहुँ कहियो हमर एकोटा वचन ।
कहियो नै सिनेमा नै कहियो उपहार,"
उलहनक फिरिस्त छलनि सगरो बारम्बार ।
पतिक आँखि भरि अयलनि, मानि लेलनि हारि,
"सुधारिलेब अपनाकेँ कएलनि करारि ।"
आब छलनि बारी पतिक लिखल डायरीक,
जेना कोनो पोथी हो श्वेत-धबल शायरीक ।
सब पन्ना खाली, कोनो अक्षर नै छल लिखल,
पत्नी पुछलनि, "की अहाँकें किछुओ नै भेटल?"
पति कहलनि, "अंतिम पन्ना पेखू" आ भ' गेला मौन,
"अहाँक त्यागक आगू सब कमी अछि गौण ।
अहाँ तँ हमर छाँह छी, आ प्राणक आधार,
अपनहि छाँहमे दोख ढुँढि सकबामे छी हम लाचार ।"
पढ़ितहि ई बात, पत्नीक नयन सँ बहय लागल अश्रु-धार,
ऐ ब्रह्मास्त्रके के रोकि सकत, शिकायतक भेल बंटाढार ।
तकर बादक वर्णन करब, ककरो ने लगतै पार,
महकि उठल घर-आँगन,आ गमकि उठल सकल संसार ।।
Sunday, February 22, 2026
प्रेमके बाँटल करी
एतेक छोट अछि जिनगी, कथीलेल मान-अपमान?
कालक गालमे फँसल अछि, सबहक देह-प्राण ।।
कालक क्रूर दाँत अचकेमे ककरो औरदा चिबा लेत ।
फेर ने महल-अटारी, ढौआ-कौड़ी किछुओ काज देत ।।
किएक करैत छी बैमानी-शैतानीक एतेक खेल?
माटिक गढ़ल ई देह अंतमे माटिएमे हेतैक मेल ।।
झगड़ा-झाँटीसँ की भेटत, मोनमे अनेरे कड़ुआहटि भरत ।
कतबो अहुरिया काटब, बीतल समय फेर आपस नै मुड़त ।।
तँ आउ ने समय रहिते घृणा त्यागि हृदयमे प्रेम जगाबी ।
ऐ दुइ दिनक मेलामे, सब मिलि-जुलिक' खुशी मनाबी ।।
किछ अहाँ अपन सुनाबी, किछु हमरो सुनि ली ।
हँसैत-खेलाइत, प्रेम बाँटिक', ई जीवन सुखसँ जीबि ली ।।
दुखियाक आँखिक नोर अपन हाथसँ पोछल करी ।
सबहकलेल नीक भाव हृदयमे हरदम सोचल करी ।।
कोनो ठेकाना नै कालक गतिके, ई अछि बड बिकट!
प्रेमके बाँटल करी सतत, पता नहि कहिया कटि जायत टिकट!!
जतय ने भेटय इज्जति तै ठाँ रुकी ने कहियो ।
किछु लोकक छन्हि आदति सदिखन चुप्पे रहता,
गलती नहि छन्हि तैयो हरदम झुकले रहता ।
मुदा जतय नहि गलती तैठाँ झुकी ने कहियो,
जतय ने भेटय इज्जत तैठाँ रुकी ने कहियो ।।
कहियो ई जुनि सोची जे संघर्ष बिलायत,
जहियातक अछि जिनगी नव-नव रूप देखायत ।
अंतकालतक लड़बालए तैयार रही सब,
सुहृद-शत्रुगण जगतीमे चिन्हबामे आयत ।।
भुलियोक' निज स्थितिपर नै रोष उचित अछि,
स्वीकारब उपलब्ध परिस्थिति होइछ उचित अछि ।
जतबा भेल संघर्ष जनिक नामो भेल ततबा,
गिरिधर रघुवर मैथिलीक परतर के करता!!
सगरो पाथर डगरि बनल अछि वन-झाँखुरमे,
सौंसे ठोकर काँट-कूस बेधय पाँखुरमे ।
मुदा ने कखनो भय राखी रस्ताक कनिकबो,
धरू भरोस स्वयंपर कालो छथि चाँगुरमे ।।
कटि रहल जंगल मुदा सब भोट कुरहरिके भेटक अछि!
सोच अछि जे देश की छै, बेंट अपने जाति के अछि!!
बुझि पड़ै अछि तंत्र हम्मर खूब मजगुत भ' रहल!
सुरक्षा जनतंत्रलेल युवराज-नृप पागल बनल!!
Wednesday, October 8, 2025
आत्म-चिन्तन
आइ एकटा बात याद पड़ि गेल । जखन कोनो बच्चा जन्म लैत छैक तँ ओ बहुत पवित्र होइछ, दुनियाँक छल-कपटसँ बहुत दूर! शनैः शनैः परिवार,समाज द्वारा अपवित्र बनेबाकलेल सांसारिकताक बहुत पाठ पढ़ाओल जाइछ आ ओ घोर संसारी बन' लगैछ । किछु व्यक्ति पूर्व जन्मक तपस्याक कारनें सांसारिकतामे लिप्त नै भ' परमात्मचिंतनमे लागि जाइछ आ जीवन-मरणसँ मुक्ति पाबक दिशामे लागि जाइछ । मुदा, ऐ तरहक व्यक्तिक संख्या नगण्य अछि, लाखो-करोड़ोमे एक-आधे एहन भेटताह । मुदा, एहन अनुभव हमरालोकनि नित्य अनुभव करैत छी, फेरो बिसरि जाइत छी ।
जखन प्रगाढ़ निद्रामे रहैत छी तँ दुनियाँक कोनों भान नै रहैछ, एते तक जे अपन देहक सहो विस्मरण भ' जाइछ । उठलाक बाद प्रगाढ़ निद्राक आनंदक अनुभव होइछ । ई आनंदानुभूति प्रातःकालमे देरी तक रहैछ, फेर सांसारिक बातसब याद आब' लागैछ आ मोन दुखी होम' लागैछ जे सूत' बेर तक दुखी बनेने रहैछ जे पुनः निंद अयलाक बाद समाप्त होइछ । मुदा, स्वप्नमे सहो बहुत परेशान करैछ ।
Wednesday, May 28, 2025
मोह तजू
"मोह तजू अपनेकलेल नै,
व्याकुल कियो रहैछ ।
कठिहारीसँ आबितहि,
स्नान तिलांजलि दैछ ।।
मुइला बाद अहाँके लखितहि,
परिजन-पुरजन तुरत परायत ।
अहाँके देखब कियो ने चाहत,
तन्त्र-मन्त्र क' तुरत भगायत ।।"
कलियुगक परिदृश्य
स्वान बनल अछि शोभा महलक,
धेनु गलीमे भटकय ।
मॉलक शो-रुम जुत्ता, पुस्तक-
सड़कक शोभा बढबय ।।
दूधक हॉकर गली-कुचीमे,
मदिरा फ्रीजक शान ।
सन्तानक सुख दुर्लभ भ' गेल,
बाप भेल छथि आन ।।
कौआ दै अछि प्रवचन,
श्रोतामे छथि मानस हंस ।
हुकरथि पाँचाली देवकी,
गरजय दुर्योधन कंस ।।
पाखंडी ठक साधु रूपमे
ज्ञानक पीटय ढोल ।
असली संतक सम्मुख अबितहि,
फ़ूजि जाइत अछि पोल ।।
संत सुवेषक लेल नै,
अभिलाषा राखैछ ।
मुदा कुवेषो रूपमे
सम्माने पाबैछ ।।
गुरु पाबक वैकल्य जँ,
शिष्यक बहुत रहैछ ।
सद्शिष्यकलेल गुरु सहो
व्याकुल सतत रहैछ ।।
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प्रारब्धक लिखल रुकि सकत नहि
राम सन पतिके अछैतो
भेल सीताके हरण,
पाँच पाण्डवके अछैतो
द्रोपदिक चीरक हरण,
चारि सुत दसरथक रहितो
बिनु सुतक प्राणक तजन,
रावणक सन शक्तिशाली
रुकल नहि लंकादहन ।
अर्जुनक सन प्रतापी
अभिमन्यु बध नहि रुकि सकल,
रुकि सकत ककरोसँ नहि,
प्रारब्धमे जे अछि लिखल ।।
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