Tuesday, April 7, 2026

बुद्धिक उपयोग

बुद्धि थिक अनमोल जगमे,
प्रकृति प्रदत उपहार ।
क्यो कपटी धर्मिष्ठ क्यो, 
होइछ अपन संस्कार ।।
होइछ अपन संस्कार, 
जेहन कुलमे जे जनमय ।
एक बनय अपकर्मी,
दोसर पुण्ये अरजय ।।
लोक सेवाभाव गंगा-
स्नानसँ हो शुद्धि ।
कपट तजि परमार्थमे 
खर्चथु अपन सब बुद्धि ।।

Monday, April 6, 2026

पाहुन थिक सुख-दुख

सुख-दुखके पाहुन बुझू,
नै जिनगिक जंजाल ।
आयब-जायब करत द्वय, 
टिकत ने बेसी काल ।।
टिकत ने बेसी काल,
जगक अनुभूति करायत ।
के अप्पन के आन,
अहाँके नित्य चिन्हायत ।।
अनासक्त रहि भोग, 
रहू विषयासँ प्रतिमुख ।
सीत-रौद समभाव 'कमल',
थिक पाहुन सुख-दुख ।।

Sunday, April 5, 2026

ध्यान स्रोतेपर राखू

राखू स्रोतेपर नजरि, निष्ठा राखू संग ।
फिकिर ने निंदकके करू, सतत रहू निःसंग ।।
सतत रहू निःसंग, धर्मके मार्ग ने त्यागी ।
कतबो होबय कष्ट, कर्मसँ दूर ने भागी ।।
कहथि 'कमल' सुनु धीर, अकथ कखनहुँ जुनि भाखू ।
अपन धर्मपर अडिग, नजरि स्रोतेपर राखू ।।

Friday, April 3, 2026

स्वार्थक मेला

दुनियाँक भीड़मे के अप्पन के आन ।
स्वार्थक मेला सब अपने सब आन ।। 
मतलबपर गोर लागत काज भेल भागत दूर ।
मानवता अछि शून्य छल-प्रपञ्च भरपूर ।।
सउँसे अछि गिद्ध पसरल उड़त अकास ।
नजरि छैक मुर्दापर वासनाक दास ।।
ककरोसँ उमेद नहि कखनो पलटि जायत ।
बिसबास जँ क' लेलहुँ सद्यः गाय गटकि जायत ।।
आइ अछि अहाँक संग काल्हि अनकर पछोड़ि ।
सप्पत खायत संग देबक संकटमे देत छोड़ि ।।
भरोस राखी विधातापर जे रचलनि संसार ।
दुनियाँ मात्र माया साँच हुनके टा दरबार ।।
जखन सब संग छोड़त बीच मझधार ।
वएह तखन हाथ पकड़त करत बेड़ापार ।।

Wednesday, March 25, 2026

मोन भारी नै करी

दुनियाँक भीड़मे के अप्पन के आन ।
स्वार्थक मेला सब अपने सब आन ।। 
मतलबपर गोर लागत काज भेल भागत दूर ।
मानवता अछि शून्य छल-प्रपञ्च भरपूर ।।
सउँसे अछि गिद्ध पसरल उड़त अकास ।
नजरि छैक मुर्दापर वासनाक दास ।।
ककरोसँ उमेद नहि कखनो पलटि जायत ।
बिसबास जँ क' लेलहुँ सद्यः गाय गटकि जायत ।।
आइ अछि अहाँक संग काल्हि अनकर पछोड़ि ।
सप्पत खायत संग देबक संकटमे देत छोड़ि ।।
भरोस राखी विधातापर जे रचलनि संसार ।
दुनियाँ मात्र माया साँच हुनके टा दरबार ।।
जखन सब संग छोड़त बीच मझधार ।
वएह तखन हाथ पकड़त करत बेड़ापार ।।

Tuesday, February 24, 2026

उलहन

वैवाहिक वर्षगाँठपर युगल-जोड़ी कएल विचार, सालभरि लिखब एक-दोसरापर उलहन-विकार। पत्नीक डायरीमे भरि गेल सगरो उलहन- "अहाँ नै मानलहुँ कहियो हमर एकोटा वचन । कहियो नै सिनेमा नै कहियो उपहार," उलहनक फिरिस्त छलनि सगरो बारम्बार । पतिक आँखि भरि अयलनि, मानि लेलनि हारि, "सुधारिलेब अपनाकेँ कएलनि करारि ।" आब छलनि बारी पतिक लिखल डायरीक, जेना कोनो पोथी हो श्वेत-धबल शायरीक । सब पन्ना खाली, कोनो अक्षर नै छल लिखल, पत्नी पुछलनि, "की अहाँकें किछुओ नै भेटल?" पति कहलनि, "अंतिम पन्ना पेखू" आ भ' गेला मौन, "अहाँक त्यागक आगू सब कमी अछि गौण । अहाँ तँ हमर छाँह छी, आ प्राणक आधार, अपनहि छाँहमे दोख ढुँढि सकबामे छी हम लाचार ।" पढ़ितहि ई बात, पत्नीक नयन सँ बहय लागल अश्रु-धार, ऐ ब्रह्मास्त्रके के रोकि सकत, शिकायतक भेल बंटाढार । तकर बादक वर्णन करब, ककरो ने लगतै पार, महकि उठल घर-आँगन,आ गमकि उठल सकल संसार ।।

Sunday, February 22, 2026

प्रेमके बाँटल करी

एतेक छोट अछि जिनगी, कथीलेल मान-अपमान? कालक गालमे फँसल अछि, सबहक देह-प्राण ।। कालक क्रूर दाँत अचकेमे ककरो औरदा चिबा लेत । फेर ने महल-अटारी, ढौआ-कौड़ी किछुओ काज देत ।। किएक करैत छी बैमानी-शैतानीक एतेक खेल? माटिक गढ़ल ई देह अंतमे माटिएमे हेतैक मेल ।। झगड़ा-झाँटीसँ की भेटत, मोनमे अनेरे कड़ुआहटि भरत । कतबो अहुरिया काटब, बीतल समय फेर आपस नै मुड़त ।। तँ आउ ने समय रहिते घृणा त्यागि हृदयमे प्रेम जगाबी । ऐ दुइ दिनक मेलामे, सब मिलि-जुलिक' खुशी मनाबी ।। किछ अहाँ अपन सुनाबी, किछु हमरो सुनि ली । हँसैत-खेलाइत, प्रेम बाँटिक', ई जीवन सुखसँ जीबि ली ।। दुखियाक आँखिक नोर अपन हाथसँ पोछल करी । सबहकलेल नीक भाव हृदयमे हरदम सोचल करी ।। कोनो ठेकाना नै कालक गतिके, ई अछि बड बिकट! प्रेमके बाँटल करी सतत, पता नहि कहिया कटि जायत टिकट!!