Sunday, February 22, 2026

प्रेमके बाँटल करी

एतेक छोट अछि जिनगी, कथीलेल मान-अपमान? कालक गालमे फँसल अछि, सबहक देह-प्राण ।। कालक क्रूर दाँत अचकेमे ककरो औरदा चिबा लेत । फेर ने महल-अटारी, ढौआ-कौड़ी किछुओ काज देत ।। किएक करैत छी बैमानी-शैतानीक एतेक खेल? माटिक गढ़ल ई देह अंतमे माटिएमे हेतैक मेल ।। झगड़ा-झाँटीसँ की भेटत, मोनमे अनेरे कड़ुआहटि भरत । कतबो अहुरिया काटब, बीतल समय फेर आपस नै मुड़त ।। तँ आउ ने समय रहिते घृणा त्यागि हृदयमे प्रेम जगाबी । ऐ दुइ दिनक मेलामे, सब मिलि-जुलिक' खुशी मनाबी ।। किछ अहाँ अपन सुनाबी, किछु हमरो सुनि ली । हँसैत-खेलाइत, प्रेम बाँटिक', ई जीवन सुखसँ जीबि ली ।। दुखियाक आँखिक नोर अपन हाथसँ पोछल करी । सबहकलेल नीक भाव हृदयमे हरदम सोचल करी ।। कोनो ठेकाना नै कालक गतिके, ई अछि बड बिकट! प्रेमके बाँटल करी सतत, पता नहि कहिया कटि जायत टिकट!!

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