Saturday, July 16, 2016

हमर गाम


 कियो लौटा दै हौ हमर पुरना गाम,                                          वेद धुनि गुंजित जहँ भोर-साँझ हरिनाम I                                   गढ़ संस्कृतक विख्यात परोपट्टा मे, 
 यग्य-जाप-पाठ-पूजा होइ छल अष्टयाम II

  अन्हरोखे तीन बजे नहाय लेल पोखरि मे,                                  वैदिक जी आबथि त’ हमहूँ सब ऊठि जाइ I                              नित्य क्रिया जल्दी क’ डिबिया जराबी झट,                              पुस्तक आ कापी ल’ पड़हक लेल बैसि जाइ II

 भोरुका पहर मे जोर स’ स’ पढिअइ त’,                                 टोलभरिक छौंड़ा सब सेहो ऊठि जाइत छल I                              सबहक़ दरबज्जा पर लाालटेम जरैत छलैक,                                 बच्चाक मधुर धुनि स’ गाम गुंजाइत छल II

  ओमहर पछबारि भाग बूढ़ सब जगला त’,                                 भोरुका पराती स' युवक सबहक निन्न टुुटल I                                  युवक महिसबार सब दौड़ल खरहोरि दिस,                                माथ पर घैल संग नारिक यूथ कूप जुटल II

  बटुकगण विद्यालय मे भोरे भोर स्नान क’ क',                                वेदपाठ-सस्वर सब उच्चस्वर मे करै छल I                                    लोक सब रस्ता पर सुनबा लेल ठाढ़ छथि,                            
  भोरुका अइ दृश्यक के वर्णन क’ सकै छल II


  दिन भरि विद्यालय मे गुरूजी पढ़बै छथि,                                उद्भट विद्वान्  सब यूथक यूथ आबै छल I                            गुरुजीक सेवे मे मेवा सब पाबि रहल,                                    हंसी खेल करिते सब विद्या के लाभै छल II

 बेरखन लोक सब जूटल विद्यालय पर,                                   गुरूजी लग शास्त्र चर्चा विद्वद्गण क’ रहल I                            फिल्ड मे बच्चा सब रमल अछि गेंद मे,                                    कृषकगण के ग्रुप मे कृषि चर्चा भ’ रहल II

 साँँझखन क’ खेतिहर सब जुटला चौपाड़ि पर,                               घंटा दू घंटा धरि कीर्तन अछि भ’ रहल I                                  
 छात्र दरबज्जा पर पुस्तक आ कापी लय,                                 टास्क इस्कूलक तैयारी सब क’ रहल II

 झंझट भेल कोनो त’ बाबा दरबज्जा पर,                                     गाम भरिक लोक बैसि निर्णय करैत छल I                                 क्षण मे समाधान भेल जाउ सब निश्चिन्त रहू ,                             केस आ मोकदमा के क्यो नामो ने सुनैत छल II

शान्ति आ प्रेमक सन्देश पसरय चारूदिस, 
परोपट्टा मे गाम केर डंका बजैत छल I                                    
बाट आ बटोही जे गुजरय अहि गाम द’ क’,                              
‘कर’ स’ निज ‘ मौलि ’ छूक' चर्चा करैत छल I                             ...................................चर्चा करैत छल II 
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Thursday, July 14, 2016

'श्रम'


" देह हम्मर गेह तोहर,
घून छैं तों नाशकरनी;
निकल छुतहरिया गे 'सुस्ती',
अकरमनता के तों जननी.
आउ जल्दी बंधुवर 'श्रम'
समर्पित अछि मोन, तन मम;
दुख तत' स' शीघ्र भागय,
दोस्त जिनकर छथि 'परिश्रम'.
दोस्त जिनकर छथि 'परिश्रम'.."

पितृ-दिवस:-


मात्र चारि बरखक छलहुँ त' माता स्वर्ग सिधारली।क्षीणतम् स्मरण। मुदा पिताक आशीर्वाद 25 बरख तक प्राप्त भेल। ओ हमर माय-बाप दूनू छलाह। ओ अजातशत्रु छलाह। सेवा भाव के धारण केने छलाह। हुनका शरीर स' जँ दुपहरियो राइत मे ककरो काज होइतै त' कहियो पाछू हट'बला नहि छलाह। हमरा पढ़ाइक लेल अपन शारीरिक कष्ट पर कहियो ध्यान नहि देलनि। हमरा कहियो कोनो काज नहि अढेलनि जे पढ़ाई मे बाधा भ' जेतनि। हमरा स' कहियो सुख नहि भेटलनि। हमरा ज्वाइन केला स' पहिले स्वर्गवासी भ' गेलाह। आइ स्मरण क' आँखि डबडबा रहल अछि। पिता! अहाँ जत' कतहु छी हम ह्रदय स' अहाँक आत्माक शांतिक कामना क' रहल छी। अहाँक ऋण स' कहियो उऋण नहि भ' सकै छी। हँ एतेक विश्वास अछि जे अहाँ जत' छी देखिक' प्रसन्न होयब जे अहाँक ई पुत्र अहाँक नाम के नीचा नहि केलक अछि आ जीवन पर्यन्त अहाँक आदर्श-सेवा भाव के अपन आदर्श बनायत।

पाहुन

मीठी रानी देखूदेखू
मुसबा दौड़ि रहल अछि घर मे.
बिल्ली मौसी आबि रहल छन्हि,
चभतनि हुनका एकहि छण मे..
ऐल कबूतर दाना दीयनु.
चिरै-चुनमुन करय चुनचुन,
तही बीच मे कूदथि वाणी,
पायल बाजि रहल छनि झुनझुन..
कौआ छत पर भोरे कुचरल,
पाहुन अयला जल द' अबियनु.
तरुआ तरिक' राखथु दादी,
जल्दी स' जाक' कहि अबियनु..
नीक निकुत भेटत आइ हमरो,
पाहुन सेहो भरि मोन खाथु.
बेर-बेर ओ मम घर आबथु,
पूत हमर घर के क' जाथु..
कौआ के द' दीअनु, कूकुर
रहथि ने भूखल ओहो जुराथु.
भिखमंगा आयल छथि देखू,
भरि इच्छा आइ ओहो खाथु..
भरिइच्छा..... ..

बरखा

बरखा आयल बरखा आयल,
गर्मी देखू दूर पड़ायल।
खुश भय मीठी कयलनि छप-छप
जीव-जंतु के मोन हर्षायल।।
जंगल मे सब जीव जुटल अछि,
नाचू सब क्यो, मोर कहै छथि।
मुदा घ'र मे घुसला सबक्यो,
मोर-मोरनी नाच करै छथि।।
सब जल जीव खुसी स' नाचथि,
कृषक बंधु के लौटल प्राण।
ह'र-बड़द संग खेत पड़ेला,
जन-बनिहारक पलटल जान।।
टर टर टर टर बेंग करै अछि,
झिंगुर बाजय झनझनझनझन।
ढन ढन मेघ करै अछि भरिदिन
गिरहतनी के मोन भेल खनखन।।
धान उपजतै भाग पलटतै,
हरबाहक मोन भे'लै हलहल।
बच्चा सब के भाते भेटतै,
नाचै गाबै हंसलै खलखल।।

चिड़िया

मोन होइऐ चिड़िया हम रहितौं,
दूर गगन मे उड़ि-उड़ि जैतौं।
पोखैर-धार के किछु मोजर नै,
गाँम-घ'र के ऊपर उडितौं।।
गाछ-बिरिछ के फल खा अबितौं,
बीच धार मे जल पी अबितौं।
छन मे उडिक' एक खेत स'
दोसर मे चट द' चलि जैतौं।
उडिक' नानी के घर जैतौं,
मौसी स' सेहो मिलि अबितौं।
दादी के घर मे चट जा क'
दालि-भात ख़ा क' चलि अबितौं।।
जै ने पैड़तै इस्कुल कहियो,
भोरका ऊठब सेहो मिटइतै।
ड्रेस पहिरबा के झंझट नै,
टास्को स' छुट्टी मिलि जैतै।।
मुदा कोना क' सहितौं बरखा,
गर्मी मे ए सी नै पवितौं।
जाड़क ठाड़ हाड़ मे लैगतै
हीटर-गीजर कत' स' लवितौं।।
मम्मी-पापा के कोरा के
स्वर्गक सुख नै कहियो पवितौं।
दादा के अमृत सम वाणी
कहू कत' जा क' हम लभितौं।।
जहिना हम छी तहिना बढियाँ
ईस दिय' हमरा वरदान।
सुख ने कहियो भेटि सकै अछि
मम्मी आँचर केर समान।
मम्मी आँचर.....।।

मदारी

देखू एक मदारी आयल,
नर-मादा बानर दू लायल.
डम डम डमरू बजा रहलअछि,
बच्चा सबके जुटा रहल अछि..
पिंकी, मुनिया, धुनिया, रुनकी,
बबलू, कप्पू दौड़ल सब क्यो.
गोल गोल घे'रि बानर के
चारू कात बैसि गेल सब क्यों..
बानर संग बनरनी नाचै,
बच्चा सब कय रहल किलोल.
थोपड़ी पीट पीट क' सब क्यो,
कूदय भ' आनंद बिभोर..
आब विदा सासुर भेल बानर,
घोघ बनरनी चट ल' लेल.
बानर किछु क'ह' चाहै त'
बनरी रूसि दूर चलि गेल..
बानर बौंस' चाहै जं जं,
त' त' बनरी बेसी रूसल.
साड़ी रुपया जखन गछलकै
तखन कोनहुना बनरी बौंसल..