Saturday, February 3, 2024

जेहन करता तेहन भोगता ।

अदृश शक्तिक डाङ् कसगर, मुदा देखबामे ने आबय । डाङ् पड़ितो किछु फरक नै, पुनः पापे नीक लागय ।। करथि गणना सभक कृत्यक, फलो तहिना भोग' पड़तै। बबूरक जे गाछ रोपतै, आम तैमे कोना फड़तै ।। जानिक' बइमान सब तँ, लोभमे गै गीर लै अछि । मुदा भोगनाहर ने बाँचय, दैव के से दोख दै अछि ।। जे करत गलती जरूरे, पापके से भोग भोगता । कर्मफल सिद्धांत अविचल, जेहन करता तेहन भोगता ।। **************************

Thursday, February 1, 2024

नारियल सम बाह्य दृढ़तम

नीक ********* नीक तकरे बुझी जे निन्दा ने अनकर करय कहियो । जदपि अप्पन त्रूटि लघुतम खेदके प्रगटैछ तइयो ।। पैघ गलतीयो जँ अनकर माफ ओ क' दैछ सदिखन । मदति अनकर करक, ताकथि- सुअवसर छोटो ओ सदिखन ।। मदति यद्यपि करथि, पर- एहसान नै कहियो जनाबथि । जरथि नै अनकर खुशी सँ जश्न हिरदय सँ मनाबथि ।। बूझि अनकर भावना, नै- किमपि ककरो पर हँसै छथि । बात अनकर हृदयके महसूस निज उरमे करै छथि ।। अपन हृदयक ध्वनिक ओ आदर सेहो सदिखन करै छथि । सत्यके संग देथि आ बलवान झूठो सँ लड़ै छथि ।। लेख कविता चित्रकारी गीत-संगीतोमे रुचि छन्हि । सकारात्मक काजमे रत व्यसन सँ अतिशय अरुचि छन्हि ।। आत्मविश्वासे भरल आ बाह्य-अंदर एक छथि, नीक श्रोता प्रखर वक्ता नम्र आ किरतज्ञ छथि ।। प्रकृतिप्रेमी जीवप्रेमी अहिंसक अतिशय सरल, नारियल सम बाह्य दृढ़तम हृदय करुणा सँ भरल ।। ***************************

Sunday, January 28, 2024

अहंता आओर प्रेम

अहंता आ प्रेम एक्के- वृक्ष के दू शाख होमय । प्रेम त्यागक लेल आतुर, अहंता लेबाक सोचय ।। अहंता लेबाक सोचय, झुकाओल सबके करै अछि। प्रेम तँ देबाक आकुल सतत ओ नमले रहै अछि ।। जे ने चिखलथि स्वाद प्रेमक प्रेम रस की बूझि सकता । उर तकर रसहीन-उस्सर जे सतत डूबल अहंता ।। बसय सबमे एके ईश्वर, प्रेम सबसँ करी सदिखन । बात ज्ञानक से की बुझता, अहंमे डूबल जे सदिखन ।। अहंमे डूबल जे सदिखन, स्वार्थ पाछाँ रहय पागल । सुधा के की स्वाद बूझत, गोबरक कीड़ा अभागल ।। बात ई कहियो ने बिसरी, ईश सबहक उर बसय । आन क्यो नहि छथि जगतमे, एके ईश्वर सबमे बसय ।। ******************************आ

Friday, January 26, 2024

सत्य-पथ आ मूल्य

जीवनक अदहा अबधि तँ नींदमे बीतैछ सबहक । बँचल अदहा केर अदहा खेलमे बीतैछ सबहक ।। तकर अदहा अवधि के तँ अध्ययनमे सब लगाबय । शेष बाँचल केर बेसी नित्यकर्मेमे बिताबय ।। गप्प-सप हँस्सी-ठहक्का मनोरंजन सँ जे बाँचय । सैह अत्यल्पे अवधि तँ धर्म-कर्मक लेल बाँचय ।। कलह-निंदा-व्यसनमे जुनि क्यो बिताबी ऐ समय के । धर्म-कर्मे-ज्ञान-उपकारे बिताबी ऐ समय के ।। कथू ने ल' क' अबै अछि कथू ने ल' जा सकै अछि । त्याग-जश-आ कीर्ति जिनकर सैह टा बाँचल रहै अछि ।। मात्र स्वप्ने टा ने देखी कठिन श्रम सँ सच बनाबी । स्वप्न के साकार क' क' पार बेड़ा के लगाबी ।। जड़ि ने बिसरी यैह दै अछि खाध-जल आ जीवनक रस । शुष्क जीवन कोन काजक जँ ने बाँचल जीवनक रस ।। अत्यधिक श्रमसाध्य जिनगी समारब अतिशय कठिन अछि । जीवनक रस भेटि गेनहुँ, मनुखता भेटब कठिन अछि ।। नीक संबंधी बनायब, जगतमे अतिशय कठिन छै । मुदा संबंधक निमाहब अहू सँ बेसी कठिन छै ।। लोभ-भय के बसमे कथमपि मूल्य कहियो ने गमाबी । सत्य-पथ निज आचरण के जान दइयो क' बचाबी ।। ****************************

Wednesday, January 24, 2024

शुक्रिया तै ईश के

शुक्रिया तै ईश के जे, हवा मुफ्ते मे देलनि । आर एतबा ख्याल रखलनि, जलक संग भोजन पठेलनि ।। जलक संग भोजन पठेलनि, व्यर्थ क्यो उपराग दै छनि । जे जरूरति होइछ हमरा, भार सब हुनके रहै छनि ।। जे रहय उपयुक्त जहिया, सैह सबटा भेटल तहिया । रहू अति संतुष्ट सब क्यो, करू ईशक शुक्रिया ।। *********************

Wednesday, January 17, 2024

निन्दक नियरे राखिए

दाग चेहरा पर देखाबय जखन दर्पण
लगा साबुन क्रीम चेहरा के मलै छी ।
दाग चेहरा स' हटायब लक्ष्य होमय
दोख दर्पण के मुदा कहियो ने दै छी ।।

जँ कियो इंगित करै छथि त्रूटि दिस तँ
होइ हुनक कृतज्ञ निज त्रुटिए भगाबी ।
क्रोध हुनका पर करब नै उचित होयत
करी स्वागत हुनक, मैत्री के बढ़ाबी ।।

बनाक' बढियाँ हुनक आँगन कुटी,
घोर निंदक लोक के नजदीक राखी ।
करथि निर्मल चित्त साबुन पानि बिन,
प्यार करियनु किमपि नै अपशब्द भाखी ।।

आन क्यो नै बुझि पड़त ऐ जगत भरिमे,
जँ अहाँ बुझबैक सबके सदृश अपनहि ।
माथपर रखने रहत सबलोक सदिखन,
बूझि जेतै ओ अहँक हृदयक भाव जखनहि ।।

Sunday, January 7, 2024

स्वर्गात् उच्चत्तरः पिता

जननि-जन्मस्थान के परतर ने स्वर्गो क' सकै अछि । मुदा जननी मातृभू स' सतत् ऊपरमे रहै अछि ।। पिता सन्तति लेल सब किछु त्याग लेल तत्पर रहै छथि । जदपि सुत निर्मोह, नै पित- त्याग मोहक क' सकै छथि ।। सकल नर दुनिया मे सबतरि विजय के इच्छा करै अछि । मात्र सुत सँ पराजय के पिता के इच्छा रहै अछि ।। त्याग-इच्छा-मोह तैं, नहि- पित जगह क्यो ल' सकै छथि । मात्र दुनिया टा सँ नहि, पित- स्वर्ग स' ऊपर रहै छथि ।।