Thursday, August 6, 2020

ओकाइत मे रही

ओकाइत जकरा होइ जतबे,
काज समुचित तकरा लेल ततबे ।
पैर ततबे पसारब नीक होअय,
जतबे नमगर अहाँक चद्दरि रहय ।।
" रहय त' ठाँव क' क' पाबी,
नै रहय तँ पबितो जाइ पड़ैतो जाइ ।। "
अनकर ने सेहंता आ ने देखाउँस करी,
जमीने पर सदिखन रही, हवा मे नै उड़ी ।।
कथमपि उचित नहि प्रतिष्ठे प्राण गमायब ।
वाह्याडम्बर अहाँके रसातल मे पहुँचायत ।।
गाछ चढ़ाक' छ' मार'बला बहुत भेटैछ,
असल रस्ता देखाब'बला बड्ड कम रहैछ ।।
उकड़ू भ' गेला पर अपने सम्हार' पड़ैछ,
बेगरता पड़ला पर कियो ने मदति लै अबैछ ।।
सुख मे अनन्त संगी-साथी भेटि जाइछ,
दुःखक घड़ी मे सब दूर-दूर भागि जाइछ ।।
जे अहाँके नीक लागैछ सुखमे सरीक होयत,
अहाँ जकरा नीक लागी सुखमे नहियो आयत ।।
ओ देखाबक आडम्बर नहि क' सकै अछि,
दुःख मे मुदा ओ अहाँके छोड़ि नै सकै अछि ।।
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Thursday, July 16, 2020

नाटकक पात्र

नाटकक छी पात्र सब,
कार्य पात्रे सम रहय ।
होथि ने मोहित कियो,
भाव पात्रे सम रहय।।
भाव पात्रे सम रहय,
मुदा नै भ' पबैत अछि ।
मोह-माया सँ ग्रसित,
मन अवग्रहित रहैत अछि ।।
पात्र जाधरि मंच पर,
ऐक्टिंग करै अछि नाटकक ।
मूल नै बिसरैत अछि,
छै भेष-भूषा नाटकक ।।
कियो अछि नारी बनल,
तँ पुरुष रूपें अछि कियो ।
एक आबय मंच पर तँ,
मंच सँ भागय कियो ।।
मंच सँ भागय कियो,
एक्केक बहु किरदार अछि ।
खन कियो पंडित बनल,
खनमे कियो अवतार अछि ।।
जीवनो हो तही सम,
बेटी बहिन माता कियो ।
कियो बेटा बाप बाबा,
बनल अछि भ्राता कियो ।।
नाटकक सब पात्र कहियो,
असलमे आकुल ने होबय ।
मंच पर हो जदपि विह्वल,
असलमे ब्याकुल ने होबय ।।
असलमे ब्याकुल ने होबय,
पंक बिच पंकज हो जहिना ।
जगक सब व्यवहारमे तँ,
एतहु ज्ञानी रहथि तहिना ।।
मूल नै बिसरी, जगत-
मंच थिक मात्र नाटकक ।
रहू सब निर्लिप्त, सोचू-
सब छी पात्र नाटकक ।।
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Monday, July 6, 2020

गुरु

"गुरु-पूर्णिमा पर सद्गुरुक चरणमे समर्पित" :-
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लभल विद्या गुरुक सेवें,
मूर्त सद्यः होइत देखल ।
मंदबुद्धिक छात्र के हम
महापंडित होइत देखल ।।
महापंडित होइत देखल,
घोंखि जड़मतियो सुजान ।
रज्जु घर्षण होइत रहने,
पाथरो पर हो निसान ।।
माइट केहनो ठोकि-पिटिक',
मूर्ति सुन्दरतम बनल ।
जन्मसँ मतिमंद रहितो,
गुरु कृपें विद्या लभल ।।
भेलहुँ ज्योतित गुरुक डिबिएँ,
तिमिर अज्ञानक हरल ।
ज्योति के दर्शन कराओल,
प्रकाशित जिनगी बनल ।।
प्रकाशित जिनगी बनल,
जगकेर सब विज्ञान पाओल ।
धर्म अर्थो काम मोक्षो,
चतुष्टय-पुरुषार्थ पाओल ।।
कूपमंडुकता मे डूबल,
ज्ञान बिन टर-टर केलहुँ ।
दिव्यदर्शन सद्गुरुक,
सद्ज्ञान लभि मौनी भेलहुँ ।।
अर्चना गुरुपद सरोरुह,
कृपा के सागर थिका ।
धरि मनुक्खक रूप गुरुवर,
ओ स्वयं हरिए थिका ।
ओ स्वयं हरिए थिका,
विधि महेशो वैह छथि ।
कोटि वन्दन चरणरज मे,
परब्रह्मो वैह छथि ।।
गुरु आ हरि छथि ठाढ़,
किनकर प्रथम अभ्यर्चना ।
गुरुकृपा सँ हरि भेटल,
प्रथम गुरुपद अर्चना ।।
------सद्गुरुचरणकमलेभ्यो नमः ।।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Thursday, July 2, 2020

प्रेम आ समर्पण


प्रेमके ब्रह्मास्त्र सँ तँ जीव केहनो बसमे आयत,
बिना प्रेमे ककर साहस हिंस्र पशु के छूबि पायत?
जखन एकटा चतुष्पादो प्रेमके सब भाव बूझय,
कृपानिधि सर्वज्ञ मोनक बात क्यै नै बूझि पायत!!
सुतल-जागल साँझ-भिनसर जे करै छथि प्रभुक सुमिरन,
बुझू निश्चय ईश्वरो सुमिरन करै छथि तनिक अनुखन ।
जीव सब लेल दया-प्रेमक जनिक उरमें भाव उमड़य,
बुझी नित बेचैन ईशो सतत हुनके लेल हुकड़य ।।
लोक सबके चाह उरमे ईश्वरक लेल होइछ जतबा,
प्रभुक सेहो चाह लोकक लेल उरमे होइछ ततबा ।
चाह यद्यपि होइछ सबके मुदा नै बिसबास सदिखन,
अनिच्छा आलस्य शंका अबिसबासे भरल हरदम ।।
डोलायब घंटी अछत-फूले के पूजा बुझय सब क्यो,
प्रभुक लेल सर्वस्व त्यागक लेल नहिं तैयार अछि क्यो ।
जखन कखनो जाइछ मन्दिर मात्र याचक भाव सबके,
प्रार्थना कष्टक निवारण हेतु केवल करय सब क्यो ।।
त्यागिक' सब मोह-ममता समर्पण सबकिछु जे करता,
तकर सबटा भार निश्चय ईश्वरे नित बहन करता ।
मात्र ईशक लेल आकुल जगत मे बिरले क्यो भेटय,
सतत जे प्रभु लेल ब्याकुल जगत मे बिरले क्यो भेटय ।।

Friday, June 26, 2020

श्रम

बुद्धि के तमने आ कोरने,
ज्ञान के हो बहुत उन्नति ।
नकल सँ अवरुद्ध हो बुधि,
नकलची के होइछ अवनति ।
तते ठेललक पोन, अपना-
पैर पर नहिं ठाढ़ भेलहुँ ।
विष्मरण चलबाक भ' गेल,
जखन बैसाखी ध' लेलहुँ ।।
स्वर्ण पिजड़ा भोज्य उत्तम,
मुफ्तखोरी तजि सकल नहिं ।
बिसरि गेल उड़नाइ, फूजल-
द्वार तैयो उड़ि सकल नहिं ।।
पीठ सुविधा केर चढ़िक'
गगन मे हम खूब उड़लहुँ ।
ईश दू टा पाँखि देलन्हि,
तहू के हमसब बिसरलहुँ ।।
तजी हमसब आश सिड़हिक,
धरब बैसाखी ने कर मे ।
रेस मे अपने सँ दौडब,
रहब आगाँ आब जग मे ।।
चाह नै खैरात के, नहिं
चाह पर सम्पत्ति के ।
चाह रोजगारेक, श्रमसँ
काटि लेब विपत्ति के ।।
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Sunday, May 24, 2020

दुःख-सुख


दुखक संग जन्मे सँ अछि
नहिं धैर्य त्यागू,
सुख बिलायत चमकि, नहिं-
अंधैर्य राखू,
आस पर जिनगी टिकल
दुख-रात्रि बिततहिं,
सुख-दिवाकर प्रगटता
बिसबास राखू ।।

धैर्य के दुख-कसौटी
जाँचय आ परखय,
दुखानल मे तपिक' सोना-
मनुज चमकय ।
मित्र-अरि के ज्ञान हो
दु:खे मे सबके,
दु:ख-रवि बिन जीवनक-
तरुवर ने पनपय ।।

होउ नहिं विचलित कनेकबो
दुःख लखिक',
दुःख-सुख आबैछ आ
चलि जाइछ अपनहिं ।
कर्म पर धरु ध्यान
आयत सुख पलटिक',
रात्रि-दिवसक सदृश ईहो-
फिरथि सहजहिं ।।

दुःखक तबधल जीवनक
धरनीक ऊपर,
सुखक जलधर बुन्द
बरखा होइछ तहिना ।
चिर विरह सँ दग्ध
बिरहिनि केर उर मे,
पिय मिलन सुख केर
बरखा होइछ जहिना ।।

रौद-छाँही सदृश दुःख-सुख
पूर्ण जिनगी के बनाबय,
दर्द संग माधुर्य विरहक-
बाद मिलनो के बजाबय ।
रहत जीवन अपूर्णे जँ-
दुनू नहिं जिनगी मे आयल,
मृत्यु संग जीवन अटल ई-
सत्य जीवन के कहाबय ।।
मृत्यु संग जीवन अटल ई-
सत्य जीवन के कहाबय !!!
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डोइर आ गुड्डी

गुड्डी के जखन
गँहिकी नजरि सँ देखैत छी
तँ बुझि पड़ैछ जे
ई डोइरक
चाँगुर मे फँसल अछि,
ऊपर जयबाक आज़ादी नहिं छैक,
जँ एकरा डोइर सँ
आज़ाद क' देल जाय तँ
ई आकाश मे आर बेसी  ऊँच
स्वच्छंद विचरण करत ।
मुदा वास्तव मे से नै होइछ,
जखने डोइर कटैछ कि
गुड्डी कनेक आर उप्पर जा
दिशाहीन भ'
एमहर-ओमहर लहराइत
दूर अनजान-सुनसान मे जा
अदृश्य स्थान मे खसिक'
विलीन भ' जाइछ !

यैह तँ जीवन दर्शन थिक !
लोक जतेक ऊँचाइ पर रहैत अछि-
ओकरा हरदम बुझाइछ जे
हम जै परिवेश सँ बान्हल छी ओ
हमरा प्रगति मे बड़का बाधक अछि,
ओ हमरा
ऊपर जयबा सँ रोकि रहल अछि ।
जेना :
घर, परिवार, अनुशासन,
माता-पिता, गुरु आ समाज ;
ओ ऐ सबसँ आज़ाद होम' चाहैछ ।
मुदा,
वास्तविकता ई अछि जे
ई सब वैह मजगूत डोइर थिक जे
हमरा ओइ ऊंचाइ पर
बना क' रखने रहैछ ।
ऐ डोइर के कटैत देरी, हम-
कने काल लेल
थोड़े ऊपर जरूर जायब,
मुदा हमर हश्र सेहो
कटल गुड्डी सदृश भ' जायत !

जँ हम ऊंचाइ के
बना क' राख' चाहैत छी तँ
भूलियो क'
डोइर सँ कटबाक नै सोची,
भले थोड़े
कष्टो किऐक ने सह' पड़य !

"डोइर आ गुड्डीक
सफल संतुलन सँ
भेटल ऊँचाइए तँ
सफल जिनगीक
मूल सूत्र थिक !!!"
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