Monday, November 18, 2019

मल्हू




आइर-धूर पर बाधे-बोने
सगरो ओ छिछिआय रहल I
धीया-पूता बाट-बटोही
सब-क्यो छै ढेपियाय रहल II

मैल-कुचैल झुलंग गंजी पर
कुरता सौंसे छै फाटल I
धोती द’ढ़ कतहु नै लागय,
सौंसे छै चेफड़ी लागल II

चिड़इ-चुनमुनिक खोंता सनके
केस ओकर छै लागि रहल I
कारी कम्मल चेथड़ी-चेथड़ी,
कुकुरक ड’रे भागि रहल II

‘मल्हू’ नाम एकर क्यो कहलक,
बूझि पड़य साफे पागल I
लोक कहय ई सिद्ध, कतेको-
एकरा सेवा मे लागल II

क्यो कहलक बहुतो संतति-सुख,
एकरा आशीषें पौलक I
न’बे कुर्ता-धोती-तौनी-
डोपटा एकरा पहिरौलक I

चीर-चारिक’ सबटा कपड़ा,
ईंटा-पाथर फोड़ि रहल I
फे’रो औघर रूप बनाक’
सौंसे अछि ई दौड़ि रहल II
******19.11.19******


Saturday, October 26, 2019

दीपोत्सव 27.10.19


लेस लीय' दीप
सब अपना हृदय मे,
पड़ायत अज्ञान-तम
दिव्-ज्ञान जागत ।
भरि चुकल कीड़ा-
मकोड़ा लोभ-मोहक,
होइत देरी ज्योति
सबटा दूर भागत ।।
साफ अंदर-बाहरो
बाढ़नि चलाक',
वृद्धि प्रेमक, द्वेष-
घृणा के भगाक'
स्वयं जरिक' करू
दुनियाँ के प्रकाशित,
परहितक हो भाव
स्वार्थकता मेटाक' ।।
करू लक्ष्मी-गणेशक-
वाणीक पूजन,
वृद्धि-धन, निर्विघ्न-जिनगी,
ज्ञान-बाढ़त ।
शान्ति सुख समृद्धि
खुशहालीक जीवन,
दिव्य आलोकित हृदय,
अज्ञान जारत।। 
प्रदूषित नै करू
पर्यावरण कथमपि,
फटक्का के त्यागि,
घृत-तेले जराबी I
अगरबत्ती आ कपूरक-
सुरभि सबतरि,
हरित हो दीपावली
बारुद के त्यागी II

प्रसादी मिष्टान्न-फल-
लड्डू चढ़ायब,
खूब बाँटू, स्वयं
सब भोगो लगायब I
होयत वाणी मिट्ठ तँ
संसार भरि मे,
स्नेह-मैत्रीभाव के
सगरो बढ़ायब II
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Saturday, October 12, 2019

हमर कल्पनाक दुनियाँ



हमर अछि सपनाक दुनियाँ महा अद्भुत,
स्नेहमय वातावरण अछि शान्त सगरो I
प्रेम आ सौहार्द्र अछि सबहक हृदय मे,
दुख दरिद्रा करय ने आक्रान्त ककरो II

क्यो ने सपनहुँ मे सोचय अपकार अनकर,
भरल अछि उर मे करब उपकार सबहक I
सब सुखी हो सब नीरुज, अछि कामना ई,
सब सुरक्षित हो अशिक्षा मेटय सबहक II

नारि-नर सब महाज्ञानी हो जगत मे,
धर्मरत पुण्यातमा हो सब गुणग I
क्यो ने कपटी धूर्त भेटय जगत भरि मे,
अहंकारक लेश नहीं सब हो कृतग II

भरल हो औदार्य स्त्री-पुरुष सब मे,
मन वचन कर्में पतिव्रत धर्म नारिक I
सकल नर मे पराक्रम सब शूरमा हो,
पुरुष सबटा व्रती होमथि एक नारिक II

महा दुधगरि धेनु दुग्धक बहय सरिता,
सर सरित नलकूप सब हो भरल जल सँ I
वृक्ष सबटा बोन मे फल सँ लदल हो,
खेत सगरो लहलहाइत हो फसल सँ II
****कमलजी****12.10.19*****

Friday, October 11, 2019

वाणी वन्दना



ज्ञानदे माँ हंसवाहिनि
बुद्धि निर्मल दे I बुद्धि निर्मल दे II

विद्या बल विवेक अम्बे दे,
स्वाभिमान भर दे I स्वाभिमान भर दे II

सत्य स्नेह त्याग भर दे माँ,
महा पराक्रम दे I महा पराक्रम दे II

शील विनय साहस संयम दे,
लोभ मोह हर ले I लोभ मोह हर ले II

भूल से भी माँ न हमसे,
किसी का अपकार होबे,
धर्म के पथ पर चलें हम,
चित्त पावन दे II चित्त पावन दे II
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Saturday, September 21, 2019

तही घर के उच्च बूझी


बूझी नहिं अति उच्च घर से,
वस्त्र लोकक जतय चम-चम I
ऊँच हो अट्टालिका अति,
देह इत्रें भले गम-गम II
देह इत्रें भले गम-गम,
आन्तरिक संस्कृति निहारी I
अतिथि के स्वागत जतय,
लखि भद्रता लोकक विचारी II
जाहि घर मे बुजुर्गक-
आनन सतत मुस्कान देखी I
स्वर्ग सम अति उच्च से घर,
तही घर के उच्च बूझी II
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Monday, September 9, 2019

अर्धनारीश्वर


अर्धनारीश्वर                                         
                  पछिला बेर गाम सँँ घुरैत काल डोकहर भगवती स्थान गेल रही. ई स्थान हमर वाल्यकालहि स’ उपासना’क स्थल रहल अछि. यादो नहि अछि जे पहिल बेर कहिया गेल हैब. संभवतः मायक कोरे मे पहिल बेर गेल होयब. अहि इलाकाक महिला सब कोर के बच्चो के भगवती’क आशीर्वाद प्राप्त करवाक निमित्त ल’ जाइत छथि. अर्धनारीश्वर रूप पर बहुत तरहक विचार चिंतन मे आबय लागल.
                        पुरुष आ स्त्री दूनू मे पुरुष अंश आ स्त्री अंश होइछ. पुरुष अंश बेसी रहला स’ बल, पराक्रम, शारीरिक उद्यमशीलता... इत्यादिक आधिक्य परिलक्षित होइछ. मातृ अंशक अधिकता स’ कोमलता, प्रेम, दयालुता, सलज्जता आदिक आधिक्य होइछ. ताही कारणे कोनो पुरुष स्त्रैण आ कोनो महिला पुरुखाहि होइछ. अधिकांश पुरुष आ स्त्री मे लिंगक अनुसारे क्रमशः पुरुष आ स्त्री अंशक आधिक्य होइछ. दूनू अंश शून्य भेला संताँ संभवतः नपुंसक उत्पन्न होइत हेतैक.
मुदा जँ दूनू अंश एके व्यक्ति मे उच्चतम स्तर के भ’ जाइक त’ की हेतैक ? निश्चित रूप स’ ओ अद्वितीय होयत आ ताही कारणे अवतारी पुरुष मे दूनू अंश उच्चतम पाओल जाइछ. राम, कृष्ण, रमण महर्षि, रामकृष्ण परमहंसदेव, गांधी इत्यादि मे ई बात प्रत्यक्ष देखना जाइछ.
राम-भरतक मिलन समयक अश्रुपात, सीताहरणक पश्चात् रामक विलाप, जटायु के कोरा मे ल’ क’ करुण क्रन्दन... आदि मातृृ अंशक पराकाष्ठा तँ विश्वामित्रक संग राक्षस सबहक बध, धनुषभंग कालक सौर्य, बालि-बध, समुद्रबंध कालक भृकुटी तानब, राम-रावण युद्ध कालक रौद्र रूप...आदि पुरुष अंशक चरमोत्कर्ष बुझना जाइछ I

Sunday, September 8, 2019

हरि चरण कखनो ने छोडू I

महद् वृक्षक सेवने जन,
छाँह-फल दूनूके लाभय ।
जँ क़दाचित फल ने भेटल,
छाँह क्यो नहि रोकि पाबय ।।
नोन व्यवसायी के सेवने,
छटाके भरि नोन पायब ।
महाराजक सेवने तँ,
कान दुहुँ सोने मढायब ।।
लोभ मे पापी के चाटब,
अहूँके संगहिं बुड़ायत ।
स्वयं अछि आकंठ डूबल,
अहूँके संगहिं डुबायत ।।
छोड़िक' हरिनाम, लछमी-
केर पाछू की पड़ल छी?
हुनक वाहन सदृश, नेत्रक-
अछैते आन्हर बनल छी?
शारदा के करू सेवन,
हंस सनके ज्ञान पायब ।
नीर-क्षीर विवेक लभिक'
जगत मे नामो कमायब ।।
बितल जिनगी छल-प्रपंचे,
आब माया-मोह छोड़ू,
जपू रामक नाम सदिखन,
हरि चरण कखनो ने छोड़ू ।।
हरि शरण कखनो ने छोड़ू ।।

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