Wednesday, March 25, 2026

स्वार्थक मेला

दुनियाँक भीड़मे के अप्पन के आन ।
स्वार्थक मेला सब अपने सब आन ।। 
मतलबपर गोर लागत काज भेल भागत दूर ।
मानवता अछि शून्य छल-प्रपञ्च भरपूर ।।
सउँसे अछि गिद्ध पसरल उड़त अकास ।
नजरि छैक मुर्दापर वासनाक दास ।।
ककरोसँ उमेद नहि कखनो पलटि जायत ।
बिसबास जँ क' लेलहुँ सद्यः गाय गटकि जायत ।।
आइ अछि अहाँक संग काल्हि अनकर पछोड़ि ।
सप्पत खायत संग देबक संकटमे देत छोड़ि ।।
भरोस राखी विधातापर जे रचलनि संसार ।
दुनियाँ मात्र माया साँच हुनके टा दरबार ।।
जखन सब संग छोड़त बीच मझधार ।
वएह तखन हाथ पकड़त करत बेड़ापार ।।

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